केंद्र सरकार के महिला विरोधी बजट का महिला कांग्रेस करेगी पुरजोर विरोध: प्रियंका अग्रवाल
बल्लभगढ़। बल्लभगढ़ विधानसभा क्षेत्र के वरिष्ठ नेता मनोज अग्रवाल व महिला कांग्रेस की प्रदेश महासचिव प्रियंका अग्रवाल ने संयुक्त रूप से भाजपा सरकार के केंद्रीय बजट के बेहद निराशाजनक और जनविरोधी करार देते हुए कहा की भाजपा सरकार की ‘अनर्थ नीतियों’ ने औद्योगिक क्षेत्र को नष्ट करने का काम किया है। इस जनविरोधी सरकार के संरक्षणवाद और पूंजीवाद ने एकाधिकार को प्रोत्साहित कर औद्योगिक क्षेत्र पर आक्रमण किया है। भाजपा सरकार के बजट का सार है- पुरखों की कमाई, मोदी सरकार ने बेच खाई।

हमने देखा है कि कैसे बजट में उन राज्यों का जिक्र हुआ, जहां चुनाव होने वाले हैं। बजट में तमिल नाडु और बंगाल की बात हुई, लेकिन मोदी सरकार की चुनावी मंशा हम सभी को पता है।
आज देश में सबसे ज्यादा बेरोजगारी है। भारत युवा देश है, लेकिन आज युवाओं के पास काम नहीं है। इस सबके बीच भाजपा सरकार ने मनरेगा को खत्म करने की साजिश को अंजाम दिया है, जो गांवों में रोजगार का एकमात्र साधन है। आज देश में आर्थिक असमानता है और बेतहाशा महंगाई है। 2022 तक सभी को छत देने का वादा आजतक पूरा नहीं हुआ, आवास योजना का फंड पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं हो पाया, ग्राम सड़क योजना की स्थिति संतोषजनक नहीं है, ग्रामीण कौशल योजना भी फेल हो गई, फसल बीमा योजना में धन घट गया, एजुकेशन का बजट घटा दिया गया, हेल्थ का बजट 2% के नीचे है। हमारी नेता सोनिया गांधी जी ने फ़ूड फॉर सिक्योरिटी की बात उठाई, जिसमें लोगों को राशन मिल रहा है, लेकिन जनगणना न होने के कारण आज करीब 5 करोड़ लोग वंचित हैं। इसके अलावा, उद्योगपतियों और व्यापारियों को भी छूट मिलनी चाहिए, क्योंकि आज हम देख रहे हैं कि लोग देश छोड़कर जा रहे हैं। डॉलर के मुकाबले रुपया गिर रहा है, विदेशी मुद्रा भंडार घट रहा है; ये बहुत चिंता की बात है।
यह बजट युवाओं, किसानों, महिलाओं, व्यापारियों और बेरोजगारों के लिए नहीं है, बल्कि बैलेट बॉक्स और वोट बैंक के लिए है। आज आम आदमी उम्मीद से पूरा बजट सुनता रहा कि शायद कुछ राहत मिल जाए लेकिन, चुनावी राज्यों को सरकार ने अपने हिसाब से ख़ुश करने की कोशिश की, पर आम आदमी की उम्मीदों को रेल गाड़ी से कुचल दिया।
अपने भाषण में वित्त मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी का फोकस पिछड़ों और वंचितों को आगे लाने का है, पर उनके बजट में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिससे पिछड़े और वंचित सच में आगे आ पाएं। बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स से उद्योगपतियों को फायदा देना और उनसे बदले में चंदा लेना ही अब सरकार की प्राथमिकता है और इसे हर भारतीय को स्वीकार कर लेना चाहिए। हर बार कुछ नए शब्दों से बजट को कर्णप्रिय बनाने का काम इन्हें भली-भाँति आता है। पिछले बजट में 5 जातियां और अब कर्तव्य भवन से निकले तीन कर्तव्य। अमृत काल का जुमला भी बजट भाषण से ही शुरू हुआ था। आर्थिक नीतियों की जगह बस शब्दों में हेर-फेर करने से देश की ग़रीबी, महंगाई और बेरोजगारी ख़त्म नहीं होती पर उन्हें क्या उन्हें तो बस अपने फायदे से मतलब है।

